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आधुनिक शिक्षा और वैश्विक निरपेक्षता

पिछले कुछ सालों में आधुनिक शिक्षा को लेकर जिस प्रकार नकारात्मक देखने को मिल रही है उससे तो यही लग रहा है विश्व अब अध्यात्म की राह छोड़ कर ढोंग की ओर अग्रसर हो रहा है जिसमें अब छोटे बच्चे पूर्ण रूप से ज्ञान देते नजर आ जाएंगे जिन्हें विद्यालयों में अपनी प्रारंभिक शिक्षा लानी चाहिए वह आध्यात्मिक ज्ञान देकर करोड़ों का टर्न ओवर भी कमा रहे है बात सिर्फ यही तक होती तो यह उनका 


निजी मामला कहा जा सकता है परन्तु जिस तरह वह वर्तमान में वो वैश्विक शिक्षा को दबे मुंह गलत बता रहे हैं, यहां भविष्य के लिए लिए किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है। हमारा आध्यात्म विश्व में बेहद शानदार और खुला,  संदेश देता है जिसमें जहां रामायण की मर्यादा शमिल है वहीं आवश्यकता पड़ने पर महाभारत  में युद्ध की सीख भी शमिल है।  ये सभी हमें समयानुसार जीवन जीने की ही प्रेरणा देता है परन्तु आज लोग ज्ञान के नाम पर सिर्फ पीछे खींचने पर लग गए है।  स्वागत है आपका uveeright पर जहां आज हम बेहद गंभीर और वर्तमान में युवाओं को शिक्षा से कम होते रुझान का मंथन करेंगे जिसका मुख्य कारण सोशल मीडिया पर पाखंड का बढ़ता प्रचार प्रसार भी है आइए इसे समझते है - 

जातीय पाखंड 
  जातीय महानता यदि वर्तमान परिस्थितियों को देख कर लगाया जाए तो यह कुछ कुछ प्रथम श्रेणी - चतुर्थ श्रेणी के बीच व्यक्तिगत मानसिकता के जैसी ही प्रतीत होती है। कहते है, जिसमें ज्ञान निवास करता है वह स्वतः ही अपना स्थान प्राप्त कर लेता है और अज्ञानता हमें कभी बढ़ने नहीं देती। बस यही कारण रहा की हो सकता है की जो आज श्रेणियों में विभाजित है कल वर्णों में रहे हो सकते हैं। अब इनमें कुछ लोगों को आंतरिक स्वार्थ रहा हो सकता है की यह फासला हमेशा यूंही बना रहे। यह मानसिकता वर्तमान समय में कुछ बुद्धिजीवियों के बयानों से समझा जा सकता है जो निचले तबके को गुरुकुल शिक्षा के लायक नहीं समझाते और वही अंग्रेजी शिक्षा को भी खत्म करना चाहते है।  यदि गुरुकुल शिक्षा को महत्ता देनी ही है तो शैक्षिक पर्यावरण में भेद पाठ्यक्रम में भेद , क्यों करना हैं। यदि मन मानी करना ही हैं तो आधुनिक शिक्षा का विकल्प हमेशा खुला होना चाहिए। 


  
सर्वशिक्षा क्यों आवश्यक हैं?
   व्यापार से केवल धन और शिक्षा से  व्यक्तिगत नैतिकता , धन और  उसका प्रबंध करने की क्षमता का विकास होता है। हालांकि यह मेरे व्यक्तिगत विचार है हर कोई इससे इत्तेफाक नहीं रख सकता क्योंकि आज शिक्षा इतनी जटिल हो गई है जहां शिक्षा केवल धन के अनुसार ही रह जाता है जहां बच्चे के गुण केवल कागज़ों ज़्यादा नजर आ रहे हैं। आज छात्र चिंता मुक्त होकर ज्ञान नहीं प्राप्त कर रहा है वह बस माता - पिता के दबाव में मेरा बच्चा सबसे अच्छा की रेस में दौड़ता नजर आ जायेगा। इसमें बच्चे का क्या विकास हुआ नहीं पता।  रीजनिंग  मानसिक कुशलता का पैमाना बन ही चुका था वहीं अब उसमें धार्मिक हस्तक्षेप का भी कही न कहीं तड़का लग चुका है या यूं कहे की बस चार कदमों की दूरी पर ही है। धर्म कभी बुरा नहीं हो सकता लेकिन उसका प्रचार प्रसार करने वाला अपने व्यक्तिगत हित जरूर साध सकता है।

  मनु स्मृति 

 हम आज फिर से मनुस्मृति के प्रसंशको को जिस प्रकार अपनी मानसिक विचारों का प्रदर्शन करते हुए सुन सकते है । उससे तो यही लगता है की पहले आधुनिक शिक्षा की बुराई फिर जातीय गुलामी............ फिर विदेशियों का हस्तक्षेप पर फिर ये जातीय तौर पर गुलाम बनाने वाले उनके गुलाम । देखा जाए तो फिर विदेशी उच्च वर्ण होना चाहिए। क्योंकि दुनिया के असल आविष्कार और उत्थान तो विदेशों में ही हुआ है । आज दुनियां में लोग हमारे ग्रंथों का उपयोग करके सीख लेते हैं फिर  वह पिछड़ने की जगह उनका उत्थान ही हुआ । 

    इन सब में सबसे ज़्यादा दुर्दशा तो महिलाओं की ही हुई है है जहां सामान्य महिलाएं घर के अंदर घूंघट में भोजन करने तक के लिए आज़ाद नहीं थी विचार रखना तो दूर की ही बात है।    वही पिछड़ी महिलाएं आत्म स्वतंत्रता का भी अधिकार नहीं रखती थीं।  जब आज स्वतंत्रता मिली है तो महिलाएं स्वयं ही घूंघट, शिक्षा में कुछ नहीं रखा , आरक्षण के खिलाफ जैसे विचारों का प्रचार करती नजर आ रही है । ये आरक्षण खत्म हुआ तो महिलाओं का आरक्षण खत्म होने में कितनी ही देर लगेगी। 

आरक्षण की समाप्ति 

  मेरा व्यक्तिगत मानना है कि सबको एक सामान्य शिक्षा और खुले अवसर आरक्षण शब्द को स्वतः ही समाप्त कर देगी और यह प्रतियोगिता जीवित रहने से ही संभव है  न की धांधली करने के लिए अच्छे परिवार में जन्म लेने का अधिकार मानना, जिसे अच्छे भाग्य से  ईश्वरीय कृपा बताना  खैर यह पाखंड का सबसे बड़ा रूप है। जो आज चरम पर देखा जा रहा है।

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