दहेज का गणित
यू तो आज हम 21 वी सदी में जी रहे है परन्तु बीते पिछले कुछ वर्षों में फिर से वही पुरानी प्रथाएं और प्रचलन शालीनता के नाम पर दस्तक देते हुए पीछे की तरफ़ घसीट लेते हैं जिसमें सौभाग्य के नाम पर बेकार के संस्कार फिर से भारतीय मार्केट में अपने पाव पसारता नजर आ रहा है जिसमें जातिवाद, भाग्यवाद, घूंघट की सुंदरता जैसी अन्य बातें शामिल हैं। जिसमें इन बातों को हवा देने वाले (50-75 वर्ष) के लोग तो अपना जीवन जी चुके हैं शायद आज से बेहतर परिस्थितियों में। ये विषय इतने बड़े हैं कि इनपर जितने तर्क दिए जा सके उतने कम है हालांकि हर चीज का एक सही समय होता है तब ही उसे ढंग से समझाया जा सकता है जैसे कि आज कल हाई प्रोफ़ाइल "दहेज मडर" बेहद चर्चा में है। जिसमें एक नव विवाहिता को दहेज में कमी के कारण सिर्फ़ 14 महीनों में ही मार दिया गया। ऐसा सिर्फ एक महिला के साथ नहीं लगातार दो बड़े मामले सामने आए हैं जिसमें दहेज के कारण दोनों को अपनी जान गवानी पड़ी । अब जानते है दहेज का गणित क्या है आखिर क्यों दहेज महिलो को निगल रहा है
दहेज का बाजार -
दहेज एक उपहार स्वरूप पिता अपनी संतान को उसकी गृहस्थ जीवन की शुरुवात के लिए सहायता के तौर पर देता है लेकिन यह उपहार दहेज का रूप तब ले लेता है जब इसमें एक दूसरे की बराबरी, झूठ और अन्य मांगे शामिल होने लगी वही इसमें योग्यता की प्रतिस्पर्धा को समाप्त करने के लिए जाति, उपजाति नजदीकी संबंधों का प्रथम अधिकार जैसे शब्द शामिल होते गए जिससे आज स्वतंत्र स्त्री लिंग समाप्त होकर कन्या धन का रूप धारण कर चुकी है जिससे महिला किसी भी जाति व गुणी हो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता, दहेज विवाह का अभिन्न हिस्सा बन चुका है । जिसमें वर पक्ष सीमित परिस्थितियों का फायदा उठाने लगता है और सामाजिक दबाव में स्त्री कन्या धन बन जाती है।
अब समझते हैं गणित - जहां कम आमदनी का परिवार अपनी कन्या के विवाह में 10 लाख का खर्च करता है जोकि सारा पैसा उसकी जेम से निकल जाता है वहीं जब एक धनी व्यक्ति अपनी कन्या के विवाह में खर्च करता है तो वह खर्च असेट्स और लाइबिलिटी का रूप धारण कर लेता है जो बाद में कही न कहीं संतुलित हो जाता है यानी 1 करोड़ का खर्च जो की अब ज़्यादा से ज्यादा 25 लाख में बदल जाता है परन्तु चकाचौंध 1 करोड़ वाली रहती है जिससे बड़ा बिजनेस मार्केट तैयार हो जाता है जिसकी लोग नकल करने लगते हैं और समाज में असंतुलन की स्थिति पैदा हो जाती है ।
दहेज में जातिवाद का संबंध - जातिवाद हमेशा चार वर्णों की नहीं होती यह मॉडर्न भाषा में सैलरी पे लेवल का रूप धारण कर रही है जिसे कभी न खत्म होने वाली बीमारी कहा जा सकता है जिसमें जातियां साम दाम दण्ड भेद का खेल - खेल कर पे- लेवल का नकाब चढ़ा रही है जिसमें शिक्षित युवा भी पीस रहा है। अब इसमें पद के हिसाब से वर पक्ष दहेज़ की डिमांड करता है कन्या पक्ष उसे पूरा भी करता है की कन्या बेहतर या बराबरी के संबंध में जा रही है । जिसमें वर पक्ष कन्या की सीमित परिस्थितियों को देखते हुए विवाह के पश्चात भी दहेज की मांग करता जाता है । और दहेज प्रताड़ना भी करता है जिससे विवाह को बचाने के लिए माता पिता पूरी भी करते जाते हैं और ये पेट कभी नहीं भरता और नौबत मारपीट और दहेज माड़र तक आ जाती है।जिसकी नकल आर्थिक तौर से निचले स्तर के वर पक्ष के लोग भी करते हैं। ये मेन
विल बी मेन सपोर्ट को भी दर्शाता है। जिसमें महिलाएं एक ही हालत पर है।
दहेज प्रथा में कमी क्यों नहीं होती -
1.जब तक समाज में बिना श्रम और साहस के ज्ञान की डिग्री मिलती रहेगी तब तक फेक स्वतंत्र दिखने वाले कुर्सी पर बैठते रहेंगे और अंदर के गंदे और अधानहीन विचारधारा को सत्ता और ताकत की सहायता से बढ़ावा देते रहेंगे और आज ये तुच्छ मानसिकता मनौवैज्ञानिक ढंग से समाज तक पहुंच भी रही है।

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